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भीगी झीनी चदरिया

भीगी झीनी चदरिया 

 
तुझे क्या पड़ी, तुझे क्या पड़ी, चाहे मरुँ मैं मौत हज़ार , 
हाय तुझे क्या पड़ी 
बरस रही हूँ मैं जैसे कारी बदरिया 
भीग रही हूँ मै जैसे झीनी चदरिया 
लगी है झड़ी, लगी है झड़ी, गम की छींट फूहार, 
मेरे मन पे पड़ी 
तुझे क्या पड़ी, तुझे क्या पड़ी, चाहे मरुँ मैं मौत हज़ार , 
हाय तुझे क्या पड़ी 
 
तू आया ना तेरा सन्देशा
तकते नैना बाट हमेशा 
आँख गड़ी, आँख गड़ी, करते तेरी जुहार,
करदी देर बड़ी 
तुझे क्या पड़ी, तुझे क्या पड़ी, चाहे मरुँ मैं मौत हज़ार, 
हाय तुझे क्या पड़ी

रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
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बचपन

बचपन

लावारिश घर छोड़े हुए, बदहाली की चादर ओढ़े हुए 
घुट घुट के सिसक रहा हूँ 
पेट में जलती आग की मांग से, कंपकंपाती टांग से,
लड़खड़ाता सा घिसट रहा हूँ 
पहचानो मैं कौन? मै देश का शोषित बचपन हूँ 
मुझसे मिलने के लिए आपको ज्यादा कष्ट नहीं उठाना है 
बस अपने आलीशान घर के पास सटे कूड़ाघर तक आना है 
वहीँ कचरा बीनता हुआ मिलूँगा 
आवारा कुत्तों से झूठन छीनता हुआ मिलूँगा 
पहचानो मैं कौन? मै देश का शोषित बचपन हूँ 
अन्धविश्वाश, निरक्षरता  और नशे की लत ने मुझे पकड़ रखा है 
शराब, अफीम और गांजे के नशे ने तन मन को जकड रखा है 
किसी अँधेरे कौने में सुन्न पड़ा मिलूँगा 
या किसी चौराहे पे भीख का कटोरा थामे खड़ा मिलूँगा 
पहचानो मैं कौन? मै देश का शोषित बचपन हूँ 
शिक्षा दीक्षा, किताब कापी से मेरा दूर दूर तक कोई नाता नहीं 
इज्जत मान, तहज़ीब कायदा, शिष्टाचार मुझे आता नहीं 
मुझपे असामाजिक तत्व का ठप्पा है 
नीच बदजात मेरी शकल पे लिखा है 
पहचानो मैं कौन? मै देश का शोषित बचपन हूँ 
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015

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गुटखा

गुटखा
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वक़्त

वक़्त 

 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
वक़्त का नवाब भी है ये आदमी
आदमी ही सत्य को पहचानता 
आदमी ही धर्म को है मानता 
जानता है राम को ये आदमी
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही झूठ को तराशता
आदमी ही सत्य को नकारता 
स्वीकारता है “काम” को ये आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही आदमी को मारता 
आदमी ही जिंदगी संवारता 
वीरता का नाम भी है आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही आइना समाज का 
वो रक्षक भी है नारी की लाज का
यहाँ भी बदनाम है यह आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
आदमी ही कायरता का रूप है 
आदमी ही मौत का स्वरूप है 
रूप है भगवान का ये आदमी 
वक़्त का गुलाम है ये आदमी 
   वक़्त का नवाब भी है ये आदमी
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015

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मुझे छू ना ना सनम

मुझे छू ना ना सनम

मुझे छू ना ना सनम, तुझे तेरी जान की कसम 
मेरी जान की कसम, मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
मेरे दिल की धड़कन बढ़ती 
मेरी साँस तेज़ सी चलती 
ना नज़र तेरे से हटती, मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
ना दिल पे काबू रहता 
मेरा जोबन दरिया बहता 
मेरा रोम रोम ये कहता, मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
जब प्रेम ज्वाला सुलगे,
साँसों की लड़ियाँ उलझे 
प्रेम बीज़ जब उपजे, तो मैं मर जाऊँगी, हाय मैं मर जाउंगी
रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट © 2015
 

मुझे छू ना ना सनम

 

 
 

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सड़क पे जन्मे बच्चे की पुकार डॉक्टर से

child birth on street

child birth on street

सड़क पे जन्मे बच्चे की पुकार डॉक्टर से

सुन रहा है ना तू, रो रहा हूँ मैं

सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं

प्रसव पीड़ा से हांफती कान्फ्ती सी, मेरी माँ

गरीबी और कुपोषण से हारती सी, मेरी माँ

देव तुल्य डॉक्टरों को पुकारती, मेरी माँ

जिंदगी की भीख मांगती, मेरी माँ

सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं………………………..1

निर्दयता और निर्लज्जता की, सारी सीमा पार कर दी

दीन हीन मरणासन्न माँ, ज़बरदस्ती बाहर कर दी

डॉक्टरों के आचरण की, इज्जत तार तार कर दी

ह्या शर्म बेच खाई, मानवता भी दूर कर दी

सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं………………………..2

असहाय बेबस होकर, गिर गई सड़क पर

बेहोशी के आलम में ही मुझे, जन्म दिया सड़क पर

मानवता हुई शर्मसार, एक बार फिर सड़क पर

भारत का भविष्य जन्मा, इस बार फिर सड़क पर

सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं…………………………….3

काश कि मेरी माँ, इस देश की लाचारी समझ पाती

हृदय हीन पापियों में वासित, भ्रस्टाचार की बिमारी समझ पाती

जिस देश में बच्चे सडकों पे जन्में, उस देश की सच्चाई समझ पाती

काश कि मुझे अपनी कोख में पोषित करने का, निर्णय ले पाती

सुन रहा है ना तू,  क्यों रो रहा हूँ मैं…………………………………4

सुन रहा है ना तू, रो रहा हूँ मैं

 रचयिता : आनन्द कवि आनन्द © 2015

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